ज़ख़्म
एक कसूर था, अब नासूर-सा है। — जो जा कर भी साथ रहते हैं, वो कभी जाते नहीं…

एक कसूर था…
अब नासूर-सा है।
वो गुरूर-सा था…
अब मगरूर-सा है।
मैं मजबूर-सा रह गया,
वो मशहूर हो गया।
मुझे बदस्तूर छोड़ गया…
और मुझमें
बस फ़ितूर रह गया।
कुछ इसरार-सा है,
थोड़ा इनकार-सा है।
ज़रा बेकरार-सा है…
अब इंतज़ार-सा है।
वो बेशुमार हो गया,
मैं शुमार हो गया।
वो निसार हो गया…
मेरा ख़ुमार हो गया।
वो आवाज़-सा था।
वो साज़-सा था।
मेरे अल्फ़ाज़-सा था…
अब
एक इल्तिज़ा-सा है।
मैं अहम-सा था…
शायद यही भरम-सा था।
वो वहम हो गया…
और
एक ज़ख़्म
रह गया।
जो जा कर भी साथ रहते हैं,
वो कभी जाते नहीं…