अकेलेपन
अकेलेपन का भी अपना मज़ा होता है। — इंसान सबसे ज़्यादा भीड़ में नहीं, अपने साथ रहते हुए बनता है।

अकेलेपन का भी
अपना मज़ा होता है।
अक्स, साँसें और धड़कनों का
एक ताना-बाना होता है।
ख़ुद से दोस्ती भी,
ख़ुदी से बहस भी।
कभी वही अपना हरीफ़,
कभी वही अपना हमराज़ होता है।
आईनों से महफ़िल सजती है,
सन्नाटों का भी
एक “वाह-बाह” होता है।
चाय के दो कपों में,
अब एक ही भरता है।
दूसरा कप…
बस आदत से रखा होता है।
बच्चों के खिलौने
अब राहगीर से लगते हैं।
कभी पाँव से टकराते हैं,
कभी यादों से।
अलमारी खोलो
तो कपड़े कम…
ख़ुशबुएँ ज़्यादा मिलती हैं।
छत वही होती है।
दीवारें वही होती हैं।
दरवाज़ा भी
उसी आवाज़ से खुलता है।
मकान तो पूरा होता है…
बस…
घर नहीं होता।
फिर भी…
इसी ख़ामोशी में
कुछ बातें साफ़ सुनाई देती हैं।
कुछ हिसाब
बिना काग़ज़ के बराबर हो जाते हैं।
और समझ आता है—
इंसान सबसे ज़्यादा
भीड़ में नहीं,
अपने साथ रहते हुए
बनता है।
इसलिए…
अकेलेपन का भी
अपना मज़ा होता है।